Wed. Apr 10th, 2024

(प्रचंड धारा) अभनपुर… ग्राम चण्डी में मां चण्डी का सिद्धपीठ मंदिर स्थापित है। चण्डी मंदिर का प्राचीन इतिहास है। शारदीय नवरात्र पर यहां हजारों लोग प्रतिदिन माता के दर्शन करने पहुंचे हैं, यहां प्रतिवर्ष हजारों को संख्या में मनोकामना ज्योत जलाई जाती है।

इस वर्ष माता चण्डी मंदिर में 1102 तेल एवं 66 घी की मनोकामना ज्योत भक्तों द्वारा प्रज्वलित की गई है, यहां सुबह- शाम माता की आरती ढोल नगाड़ों के साथ की जाती है। आरती में हजारों लोग शामिल होते हैं। माता का प्रतिदिन अलग- अलग रूपों में श्रृंगार किया जाता है। रात्रि में प्रतिदिन भजन मंडली द्वारा जस गीत कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। वर्तमान में चंडी मंदिर समिति के अध्यक्ष कांति भाई चावड़ा, राजू निम्बेकर , नील मनीष टंडन, संदीप दीवान, डॉक्टर चंद्राकर, विद्याभूषण सोनवानी, जागृत कोसले, रावेन्द्र तारक, आदि लोग सेवा में लगे हुए हैं। मंदिर के प्राप्त इतिहास से संबंध में वृद्धजनों, किवदंतियों, खोजकर्ता की लेखनीयों एवं वर्तमान भक्तों जिन्होंने अपने बाल्यकाल से माता की भक्ति मंदिर से लगाव एवं चण्डी गांव की बावली में अपने जीवन की अविस्मरणीय क्रियाकलापों का जो सार प्राप्त हुआ है, उसके आधार पर समिति द्वारा निम्नांकित जानकारियाँ एकत्रित की है। मंदिर या आसपास कोई शिलालेख नहीं होने से अध्ययन ही इतिहास का आधार है।

मानचित्र में भौगोलिक स्थिति

रायपुर जिले के अभनपुर तहसील के अंतर्गत महानदी एवं खारून नदी के मध्य स्थित चण्डी नामक स्थान है। पूर्व नाहना और चण्डी यह दो गाँव थे जिसे महल के रूप में संबोधित किया जाता था। ब्रिटिश रिकार्ड में इसका उल्लेख मिलता है कि जहाँ पर चण्डी देवी मन्दीर है यह ग्राम चण्डी और इसी से लगा हुआ आगे का ग्राम जहाँ एक बधबुड़ा तालाब है नाहना नामक ग्राम था। जो कि कालांतर में चण्डी ग्राम में शामिल हो गया है जो वर्तमान में चण्डी ग्राम के नाम से जाना जाता है। लेकिन सरकारी रिकार्ड में नाहना चण्डी एक साथ लिखा जाता है। ग्राम चण्डी का क्षेत्रफल 583.41 हेक्टेयर है प्रारंम्भिक काल में चण्डी ग्राम अभनपुर ब्लाक का सबसे बड़ा व्यापारिक के रहा करता था, जिसमें साप्ताहिक बाजार, शासकीय भवन, शाला, पीली हुई, कुम्हार के मुद्राण्ड, मवेशी बाजार एवं मेला मण्डई के नाम से प्रसिद्ध था।

प्राचीन स्थापना की गणना

राजिम से चण्डी की दूरी लगभग 23 कि.मी. है। पाण्डुवंशी को सोमवंशी भी कहा जाता है। ग्राम चण्डी में चण्डी मंदिर के आसपास प्राचीन टीलों से निर्मित दीवारों की पंक्तियों दिखाई देती थी, जो कि दूर सोमवंशी कालीन प्रतीत होती है। सिन्दुरी रंग की ईंटो का आकार 34 19.5-7 से.मी. है जो कलचुरी कालीन संभावित है। प्रतिमा के पीछे के हिस्से में जो प्रभामण्डल बना है वह दो नग दृष्टव्य है। यह सोमवंशी कालीन 6-7 वीं सदी है। अनुमान लगाया जाता है कि राजिम तथा आसपास के क्षेत्र में चण्डी ग्राम भी महाशिव तिरदेव का साम्राज्य क्षेत्र का प्रशासनिक इकाई के अंतर्गत रहा होगा।

इस मंदिर में या इसके आसपास ना शिलालेख है, ना ही ताम्रफ है और ना ही प्रारंभिक रूप। लेकिन यहाँ के पुरावशेष, ईंट और मूर्तियों के आधार एवं अन्य स्थलों के मंदिर एवं पुरावशेषों से तुलनात्मक आध्ययन के द्वारा निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह सोमवंशीकालीन मंदिर रहा होगा। वह कालांतर में क्षतिग्रस्त हो गया, अतः अनुमान लगाया जाता है कि चण्डी मंदिर का प्रथम निर्माण महाशिव तीवरदेव के शासनकाल 550-600 ईस्वी के मध्य हुआ होगा। स्थानीय जनश्रुति मिलती है कि बगुला स्वरूपी चण्डी माता का मंदिर प्राचीन काल में शक्ति पीठ के रूप में जानी जाती थी। यह सिद्धि प्राप्त करने का श्रेष्ठ स्थान होता था। अभनपुर के पुराने थाना कक्ष में एक लेख में रावण के द्वारा सिद्धि हेतु पूजन का उल्लेख था, जो आधुनिक थाना भवन में उपलब्ध नहीं है।

आरंग के राजा मोरध्वज और राजिम के राजा जगपाल जी इसी रास्ते में आरंग से राजिम होकर अभनपुर, चण्डी, सोनपुर होते हुए पाटन और वैरागढ़ जाते थे सोनपुर की महामाया माता का प्राचीन मंदिर और मध्य में तरीघाट नामक ग्राम है। खारून नदी के तट पर स्थित है यहाँ प्राचीन टीला है, जिसमें पुराशेष भौतिक रूप से शासकीय खुदाई से प्राप्त हुए है। क्षेत्रीय ग्रामीणजनों की किंवदती में चण्डी के आसपास घना जंगल तेंदू के वृक्ष और पलाश के केसरिया फूल आकर्षण का केन्द्र होते थे। वर्तमान के व्यजन अपने बाल्यकाल में चण्डी के स्कूल में विद्या अध्ययन कर मंदिर के निकट बावली तालाब के किनारे भोजन कर बावली का स्वच्छ पानी पीते थे जिसे ग्रामीण जन भी पीने हेतु उपयोग करते थे।

कुछ वर्ष बाद गाँव के कोई विक्षिप्त व्यक्ति ने इस देवी प्रतिमा को खण्डित कर दिया। मूर्ति के खण्डित अवशेष मंदिर व ज्योतिकक्ष जाने वाली सीढ़ियों के नीचे पीपल की छांव में आज भी वे गये है। कालांतर में लगभग 1946 ईस्वी में तत्कालीन उपयंत्रे श्री श्रीवास्तव जी ने इस मंदिर का पुनः निर्माण करवाया था। राजस्व विभाग के अमीन स्व. काशीनाथ तिवारी जी जो चित्रकार, मूर्तिकार थे, लगभग सन् 1948 ई. में इन्होंने देव प्रतिमा को पुनः आकार दिया था। मंदिर से लगे परिसर में शक्ति के साथ शिव का होना तय है, इसी प्रांगण में शिव का प्राचीन मंदिर था जो पीपल के वृक्ष के गिरने से क्षतिग्रस्त हुआ, जिसे कालांतर में गोल गुम्बज का आकार देकर पुनः निर्माण किया गया था।

समिति गठन के पश्चात् विभिन्न आकर्षक कलाकारी से नवीन गुम्बज एवं दिशा बदलकर मुख्य द्वार का निर्माण करवाया गया है। समय के चक्र ने भक्तों को प्रेरित किया और गर्भगृह के बाद चारों ओर आहते का निर्माण हुआ। काफी समय तक इसी गर्भगृह के समक्ष आहते में बैठक आयोजित कर समिति का गठन सन् 1993 को किया गया था। संगठन और सदविचारो की परिकल्पना से समिति ने 31 वर्षों में जो कार्य किये वो आज आपके समक्ष है।

प्राचीन जानकारियों की लेखनी

चण्डी मंदिर के प्राचीन अवशेषो मान्यताओं, भौगोलिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि का सचित्र वस्तृत विवरण हमारे क्षेत्रीय दो लेखक श्री सुरेश कुमार साहू ग्राम बैलर ने अपनी पुस्तक अभनपुर तहसील की चण्डी के प्रथम संस्करण 2012 में एवं श्री चेतन भारती ग्राम मोहंदी ने अपनी पुस्तक चण्डी माता की महिमा के प्रथम संस्करण 2021 में उपलब्ध करायी है। जिसमें मंदिर देवी की आराधना, भक्तों की भावनाओं और किवंदतीयों की कथा के साथ समिति सदस्यों के अथक प्रयासों का भी उल्लेख किया गया है। प्राचीन चित्रों का समावेश भी हमने इस पोस्टर में किया है।

वर्तमान गतिविधियाँ

समिति के द्वारा वर्तमान में धार्मिक गतिविधियों में चैत्र एवं वचार नवरात्र पर्व में 17 ज्योति कलश से प्रारम्भ करके आज लगभग 1100 से 1200 मनोकामना ज्योति कलश का सम्पूर्ण अनुष्ठान के साथ प्रज्जवलित किये जाते है। छेरछेरा पुत्री के समय विशाल दो 7 दिवसीय मण्डई का आयोजन, | शिवरात्रि एवं हनुमान जयंती में अभिषेक पूजा आदि सम्पन्न किये जाते है। कथा, भागवत प्रवचन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रतियोगिता आदि सम्पन्न किये जा रहे हैं। भविष्य में मंदिर 1 एवं बावली परिसर को अभनपुर क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ धार्मिक पर्यटक स्थल का निर्माण हमारी कल्पना है। आप धर्मनिष्ठ दानदाताओं, भक्तों एवं सेवाभावी कार्यकर्ताओं का सहयोग ही हमारी पूंजी एवं ऊर्जा है। श्रद्धालुओं की मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित करने हेतु संगठन के सद्विचारों की परिकल्पना से समिति ने पिछले 30 वर्षों में मंदिर के आकार एवं सुविधा में गतिविधियों में बावली के रूप में परिवर्तन एवं धार्मिक अनुष्ठानों के जो कार्य किये है वे आपके दानशीलता, क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं की लगनशीलता के बिना सम्भव नहीं था। चण्डी माता के मंदिर परिसर में यादव समाज, ठेठवार समाज, एवं सेन समाज भी अपने अपने आराध्य देवों के मंदिर का निर्माण – किया है।

जय चण्डी माँ 🙏❤️

PIC BY – 📷Ananya Nimbekar